ईशान और वो एलबम जो दरवाज़े की तरह खुल गया
आयु 5–8
जब दादाजी का पुराना फ़ोटो एलबम जादुई दरवाज़े की तरह जगमगाकर खुलता है, तो ईशान अपने परिवार के बीते हुए गाँवों, बंदरगाहों और रसोइयों में पहुँच जाता है, और जान लेता है कि वह भी इस कहानी का हिस्सा है।

ने सोफ़े को थपथपाया। “आओ, यहाँ बैठो,” उन्होंने कहा। “ये पुराना एलबम एक दरवाज़ा है, ईशान। इसे खोलो, और हम सीधे अंदर चलेंगे।” वह सोफ़े पर चढ़कर पास बैठ गया, पर मन में एक छोटी-सी चिंता फड़फड़ा रही थी: क्या इस पुरानी चीज़ों में से कुछ भी उसका अपना लगेगा?
कवर चरचराकर खुला और रोशनी ऐसे बाहर फैली जैसे मर्तबान से धूप निकल आई हो। पन्ने पर एक नन्हा-सा गाँव का चौक जगमगा रहा था। “मैं बचपन में यहीं रहता था,” ने कहा। “अंदर आकर देखो, और बताओ, क्या ये हमारा-सा नहीं लगता?”
सुर्र! ईशान धूप से गर्म एक चौक में खड़ा था, जिसके चारों ओर लाल खपरैल की छतें थीं। बच्चे एक लकड़ी का छल्ला लुढ़काते हुए फ़व्वारे के पास से दौड़ गए। वह पत्थरों के फ़र्श पर अपने भूरे जूते इधर-उधर घिसने लगा, मन में झिझक थी। ये उसका चौक तो नहीं था। या था?


