सान्वी और हिम्मत वाला पत्थर
आयु 5–8
जब चश्मे पर हुई हँसी चुभती है, तो सान्वी को अपनी मज़बूत, शांत आवाज़ मिलती है। वह तनकर वहाँ से चल देती है, और जान जाती है कि अपनी बात कहने से दोस्त और भी पास आ जाते हैं।

सुबह की धूप ने स्कूल के मैदान को सुनहरा कर दिया था। सान्वी कूदती-फाँदती अंदर आई। उसका चश्मा धूप में चमक रहा था। वह खुश थी, पूरी तरह तैयार थी। उसकी जेब में हमेशा की तरह छोटा-सा हिम्मत वाला पत्थर था, चिकना और ठंडा।
गुंबद के पास कबीर नाम का एक लड़का उँगली उठाकर हँसा। “हा-हा-हा! ये चश्मा कितना बेवकूफ़ों जैसा लगता है!” उसकी वह हँसी ठंडे पानी के छींटे की तरह सीधे सान्वी के दिल पर लगी।
सान्वी के गाल गरम होकर चुभने लगे। उसका मन हुआ कि कहीं छिप जाए। पर उसका हाथ जेब में रखे हिम्मत वाले पत्थर तक पहुँच गया, गोल और पक्का। “रुको,” उसने अभ्यास करने के लिए धीरे से कहा। “मुझे ये अच्छा नहीं लगता।”


