रोहन और पहाड़ों वाले ख़ज़ाने की खोज
आयु 7–8
जब पुराने लाइटहाउस का लैंप बुझ जाता है, तो रोहन को उसकी घुमावदार सीढ़ियाँ चढ़नी हैं और गुणा के जादू से हर चमकता दरवाज़ा खोलकर रौशनी वापस लानी है।

पुराना लाइटहाउस अँधेरे में डूब गया था। न कोई लैंप जल रहा था, न कोई किरण, पानी पर रौशनी की एक झलक तक नहीं। "कोई रखवाला बहुत पहले यहाँ से चला गया था," पिपू ने डगमगाते हुए पास आकर कहा, "और रौशनी कहीं ऊपर खो गई है। पर इन सीढ़ियों का हर दरवाज़ा एक पहेली से बंद है।" रोहन ने अपने जूतों के फ़ीते कस लिए और मुस्कुराया। "तो चलो, पहेलियाँ सुलझाते हुए ऊपर चलते हैं।"
पहला दरवाज़ा घूमती हुई रौशनी से जगमगा रहा था। "तीन गुणा चार," पिपू ने ज़ोर से पढ़ा और तीन छोटी-छोटी लकड़ी की नावें रख दीं, हर नाव पर चार पाल तने हुए थे। "तीन समूह, हर समूह में चार," रोहन ने हर नाव को छूते हुए कहा। "चार... आठ... बारह!" दरवाज़ा गुनगुनाया, और तेज़ चमका, और चरर्र की आवाज़ के साथ खुल गया।
दरवाज़े के पार एक तंग चबूतरा था, जिसकी दीवार खड़िया वाली स्लेट जैसी थी। "हर समूह बराबर होता है," रोहन ने पिपू को समझाया और तीन छोटी नावें बनाईं, हर नाव पर चार पाल। "इसी को गुणा करना कहते हैं!" पिपू की लालटेन ख़ुशी से टिमटिमाई। "बारह सीढ़ियाँ चढ़ीं, तो बारह पाल," वह खनखनाती हुई ऊपर की ओर बढ़ चली।


