सान्वी और शरीर का अजूबा म्यूज़ियम
आयु 4–7
जब सान्वी एक नन्हे दाने जितनी छोटी हो जाती है, तो वह अपने ही शरीर के अंदर बने अनोखे म्यूज़ियम की सैर करती है और जान लेती है कि शरीर क्यों हाँफता, फूलता, धड़कता और बढ़ता है।

सान्वी को सोचना, झाँकना और टटोलना बहुत पसंद था। “मेरे अंदर क्या है?” उसने चीं-चीं करते हुए पूछा। तभी उसके आतिशी शीशे वाले लॉकेट में चमचम रोशनी जगी, और वह रोटी के एक नन्हे टुकड़े जितनी छोटी हो गई, घूमती हुई नीचे, और नीचे, और नीचे!
सान्वी एक नरम गुलाबी फ़र्श पर उछलकर उतरी। वह एक चमकती सुरंग में थी, जिसके आगे एक मेहराबदार दरवाज़ा था। एक गोल-मटोल गाइड हँसते-हँसते तैरता हुआ आया: “अंदर तुम्हारा स्वागत है! मैं हूँ डॉक्टर पिप्पी, मेरे पीछे-पीछे आओ! धक-धक, सर-सर, बढ़ो, बढ़ो, बढ़ो!”
वे दोनों एक लाल, धक-धक करते गलियारे में सरपट आगे बढ़े। गरम रोशनी की धाराएँ घूमती और भागती जा रही थीं। “यह खून है, हमेशा दौड़ता रहता है!” डॉक्टर पिप्पी ने मुस्कुराकर कहा। “यह शरीर के हर हिस्से तक अच्छी चीज़ें पहुँचाता है!”


