कबीर का घर बदलने का मज़ेदार सफ़र
आयु 3–7
घर बदलने के दिन कबीर अपने पुराने घर के हर कोने को प्यार से अलविदा कहता है, यादों के डिब्बे में छोटे-छोटे ख़ज़ाने सहेजता है, और नए घर में एक नया कोना ढूँढ लेता है जो उसका अपना बन जाता है।

“अलविदा, अलविदा, ऊँचे-से हॉल को अलविदा!” कबीर ने गाया, ऊँचे-ऊँचे डिब्बों के पास वह कितना छोटा लग रहा था। पुराना घर ख़ाली, चुप और सूना खड़ा था, पर जेब में बैठे पिप ने कहा, “चूँ-चूँ — मैं यहीं हूँ!”
“अलविदा, अलविदा, चमकती रसोई को अलविदा!” बर्तन खनखन-छनछन करके साथ गाने लगे। फ़्रिज धीमे-धीमे गुनगुना रहा था, रसोई की स्लैब ख़ाली थी — वहीं तो कबीर की कुकी खाने की मनपसंद जगह हुआ करती थी।
“अलविदा, अलविदा, चरमराती पुरानी सीढ़ी को अलविदा!” तेरहवीं सीढ़ी, जिस पर हमेशा सँभलकर चलना पड़ता था। पिप हर कूद पर इतने ज़ोर से चूँ-चूँ करता कि कबीर खिलखिलाकर हँस पड़ा और हँसी रोकना ही भूल गया!


