पीहू का बहादुरी भरा पहला दिन
आयु 3–6
नए स्कूल के पहले दिन पीहू बहादुर बनना चाहती है, और उसके कंधे पर एक चिंता-चिड़िया बैठी है, जो हर प्यारे चेहरे और हर नए दोस्त के साथ छोटी होती जाती है, और छुट्टी के समय उड़ जाती है, और पीहू ख़ुशी से दौड़कर अपने बड़ों की बाँहों में पहुँच जाती है।

स्कूल के पहले दिन की सुबह, पीहू के कंधे पर कुछ छोटा-सा, फड़फड़ाता हुआ आकर बैठ गया। वह एक चिंता-चिड़िया थी, धूल जैसे नीले पंखों वाली। “क्या तुम्हें पक्का यकीन है कि यहाँ आना ठीक है?” वह चीं-चीं करके बोली। पीहू बहादुर बनना चाहती थी। उसने अपना कागज़ का सितारा सहलाया और एक गहरी साँस ली।
“आओ, आओ, अंदर आओ!” एक प्यारी-सी आवाज़ आई, और पीली आस्तीन ने उसे हाथ हिलाकर बुलाया। पीहू ने दरवाज़े की चौखट के पीछे से झाँका। चिंता-चिड़िया ने अपने पंख फुला लिए और मुँह छिपा लिया। लेकिन पीहू फिर भी अंदर चली गई।
कालीन वाले कोने में हर गद्दी पर कोई न कोई बैठा था! पीहू की ठोड़ी काँपने लगी। तभी मीना मैडम ने अपने ठीक बगल वाली जगह थपथपाई। “एक और के लिए जगह है,” उन्होंने कहा। और चिंता-चिड़िया छोटी हो गई, बस ज़रा-सी, ज़रा-सी।


