वीर और खुला हुआ बड़ा फाटक
आयु 3–5
वीर हर दिन झूलों की ओर दौड़ लगाता है, लेकिन एक दोपहर वह रुककर एक नन्ही बच्ची के लिए पार्क का भारी फाटक थामे रखता है, और सीखता है कि ज़रा-सा रुक जाना भी सबसे बड़ा रोमांच बन सकता है।

रोज़ दोपहर के खाने के बाद वीर कंकरीले रास्ते पर दौड़ पड़ता, जैसे जूते पहने कोई रॉकेट हो। सर-सर, सर-सर करते उसके जूते चलते। झूले उसका इंतज़ार कर रहे थे, और वीर से भी बिल्कुल सब्र नहीं हो रहा था!
सर-सर, सर-सर! वीर को कोई नहीं रोक पाता था। न डगमग करती गिलहरी, न भिनभिनाती मधुमक्खी। उसका बस एक ही काम था: सबसे पहले झूले तक पहुँचना!
लेकिन आज बड़ा हरा फाटक चुपचाप खड़ा था। धूप वाली टोपी पहने नन्ही धक्का देती रही, देती रही, पर भारी फाटक ज़रा भी नहीं हिला। उसकी गोद से उसका खरगोश फिसलकर गिर गया!


