वीर का सोने से पहले वाला जासूस खेल

आयु 3–5

जब कल की चिंता से सोते समय वीर के ख्याल दौड़ने लगते हैं, तो एक नरम चमक वाला साथी उसे पाँच इंद्रियों का एक खेल सिखाता है, जो उसकी मचलती, भनभनाती रात को शांत और आरामदेह बना देता है।

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फिर से सोने का समय हो गया, और वीर के मन में ख़याल मधुमक्खियों की तरह भनभना रहे हैं—भिन-भिन, भिन-भिन! कल की बड़ी सैर का ख़याल गोल-गोल घूमता ही जा रहा है। वह चाँद वाले रज़ाईदार कंबल पर उछल रहा है, बिल्कुल जगा हुआ, मचलता हुआ, ज़रा भी नींद नहीं।

तभी—श्श्श!—किताबों की अलमारी से एक नन्ही-सी चमक तैरती हुई आती है। यह पिप्पू है, जुगनू-उल्लू, जो तभी आता है जब सोते समय मन में ख़यालों की भीड़ लग जाती है। “मुझे एक खेल आता है,” पिप्पू धीरे से बोलता है, “जो तुम्हारे भनभनाते ख़यालों को चुप करा देगा।”

“मैं पाँच इंद्रियों वाला जासूस हूँ,” पिप्पू कहता है, “और तुम भी! धीरे हो जाओ, चारों तरफ़ देखो, जासूस का वक़्त है! पहला सुराग़: पाँच चीज़ें ढूँढो जो तुम देख सकते हो।” वीर लकड़ी की मूठ वाला ताक़तवर शीशा उठाता है और मुस्कुरा देता है।

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