आदित्य और उसकी मज़बूत, सुरक्षित आवाज़
आयु 3–5
सुनहरी पतझड़ की एक दोपहर में जब बड़े बच्चों का लुढ़कने-गिरने वाला खेल बहुत ज़ोर-ज़बरदस्ती वाला हो जाता है, तो आदित्य दोनों पैर घास में मज़बूती से जमा लेता है और मना करने के लिए मज़बूत, विनम्र शब्द ढूँढ लेता है।

आदित्य के पसंदीदा पार्क वाले दिन सुनहरे पत्ते घूम-घूमकर नीचे गिर रहे थे। वह कंकड़ वाली पगडंडी पर उछलता-कूदता चला जा रहा था। लाल कंकड़ उसकी जेब में आराम से रखा था, और वह अपने ही लिए कड़-कड़, चर-चर की एक धुन गुनगुना रहा था।
गद्दों के पास मोनू और दो बड़े बच्चे पत्तों का एक डगमग पहाड़ बना रहे थे। "आओ, हमारे साथ चढ़ो और धड़ाम से गिरो!" मोनू ने दोनों हाथ ऊपर हिलाते हुए और खूब मुस्कुराते हुए पुकारा।
पत्तों का ढेर किसी बहुत ऊँची मीनार की तरह झुक रहा था और हिल रहा था, जैसे अभी गिर पड़ेगा। बड़े बच्चे कोहनियाँ चलाते हुए उसमें धम्म से कूदे, और पत्ते चारों तरफ़ उड़ गए। आदित्य अपने पैर जमाए चुपचाप देखता रहा, एकदम स्थिर।


