कबीर की जंगल में फुसफुसाती सैर

आयु 3–5

भागदौड़ भरी सुबह की सैर में कबीर अपनी तेज़ आवाज़ को धीमा करना सीखता है, घोंघे की तरह आराम से चलना सीखता है, और जंगल की उस चुपचाप बजती मीठी धुन को खोज लेता है जो वह हमेशा से बजा रहा था।

"कबीर की जंगल में फुसफुसाती सैर" का कवर

“व्हीईईई! मुझे देखो!” कबीर चिल्लाया और चमकती-सी पगडंडी पर धम-धम करता चल पड़ा। उसके दोनों हाथ खूब झूल रहे थे। उसकी ऊँची आवाज़ हर पेड़ से टकराकर गूँज उठी, जैसे कोई घंटी जो बजती ही जा रही हो।

साथ चल रहे बड़े के जूतों से ज़रा भी आवाज़ नहीं हो रही थी। बस चीड़ की पत्तियों पर हल्की-सी चर-मर, चर-मर, चर-मर, जैसे जंगल भी दबे पाँव उनके साथ-साथ चल रहा हो।

“पर मुझे तो ज़ोर से बोलना अच्छा लगता है!” कबीर ने पैर पटककर कहा। फिर उसने ज़रा देखने के लिए एक नन्ही-सी फुसफुसाहट आज़माई। उससे उसके अपने ही कानों में गुदगुदी हुई।

"कबीर की जंगल में फुसफुसाती सैर" का पृष्ठ 1"कबीर की जंगल में फुसफुसाती सैर" का पृष्ठ 2"कबीर की जंगल में फुसफुसाती सैर" का पृष्ठ 3

अपने बच्चे के नाम और फ़ोटो से बनाएँ · कहानी पुस्तकालय देखें