आदित्य का छोटा-सा मददगार दिल
आयु 3–5
जब घर वाले रात के खाने की तैयारी में लगे हैं, आदित्य का मन खेलते रहने का है, पर बिखरे हुए खेल के कमरे पर एक नज़र उसके दिल को छू जाती है, और वह चुपचाप अकेले ही सब समेटकर सबको चौंकाने का फ़ैसला करता है।

पटरियाँ बिखरी थीं इधर-उधर, कहीं गोल-गोल, कहीं सीधी-सीधी। आदित्य अब तक की सबसे लंबी पटरी बना रहा था। वह मज़े से गुनगुना रहा था, उसे गंदगी की ज़रा भी फ़िक्र नहीं थी।
रसोई से खटर-पटर की आवाज़ आ रही थी, पतीले में कुछ खदबद पक रहा था। थके हाथ काट रहे थे, चला रहे थे, चलाए जा रहे थे। खाना बनने में कितनी देर लग रही थी! आदित्य ने दरवाज़े की ओट से झाँका, उसकी सीटी गले में झूल रही थी।
“मुझे तो खेलते रहना है,” वह ज़रा-सा मुँह बनाकर बोला। पर फिर उसने उन व्यस्त हाथों को देखा, और धीरे से पलट गया। समेटो-समेटो, समेटो-समेटो, उसका मददगार दिल सच्चा है!


