आरव की मुस्कानों से भरी जेब

आयु 3–5

स्कूल जाते हुए आरव एक गुप्त खेल खेलता है: मुस्कान को छोटी-सी जेब में रखना और रास्ते में मिलने वाले हर किसी को बाँट देना, और हैरानी से देखना कि एक मुस्कान कैसे बहुत सारी मुस्कानें बन जाती है।

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आरव ने एक बिल्कुल नई मुस्कान पीले दस्ताने की जेब में गहरे तक रख ली। गरम, भरोसेमंद हाथ को कसकर पकड़े हुए वह फुसफुसाया, “आज मैं अपनी मुस्कानें सबको बाँटूँगा!”

वे दोनों फुटपाथ पर चल पड़े, हाथ झुलाते हुए, एक-दो, एक-दो। उसके पीले बूटों के नीचे कुरकुरे पत्ते ‘नमस्ते’ कह रहे थे। आरव गा उठा, “मुस्कान ढूँढो, मुस्कान ढूँढो, चलो चलें!”

मोड़ पर बड़ी पीली बस खड़ी थी, और स्टीयरिंग के पीछे बैठे थे रमेश चाचा, टोस्ट की तरह थके-थके। आरव पास सरक गया और अपनी सबसे चमकीली मुस्कान बिखेर दी।

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