कबीर का शुक्रिया वाला कंकड़-जार
आयु 3–5
एक उदास, बुझे-बुझे दिन में कबीर को एक भी अच्छी बात याद नहीं आती — जब तक कंकड़ों वाला नन्हा जार उसे तीन अच्छी बातें ढूँढने में मदद नहीं कर देता, एक-एक चमकीले टप के साथ।

कमरे में लैंप की धीमी रोशनी है। कबीर अपने काई-हरे पजामे में अपने गर्म कमरे में है। पर आज का दिन ऊबड़-खाबड़ रहा — दूध गिर गया, खिलौना खो गया — और कबीर चिड़चिड़ी-सी साँस भरकर रज़ाई पर धम्म से लेट जाता है।
"मुझे तो कोई भी अच्छी बात याद नहीं आ रही," कबीर रज़ाई पर लात मारते हुए बुदबुदाता है। बिस्किट कंकड़ों का छोटा कटोरा कबीर के पास खिसका देता है, जैसे कह रहा हो — चलो साथ मिलकर ढूँढते हैं, एक-एक छोटा कंकड़ उठाकर।
कबीर एक कंकड़ उठाता है। टप! एक अच्छी बात। "झूले," वह धीरे से कहता है, और उसे याद आता है कि पैर हवा में कितने ऊँचे जाते थे और हवा सर्र से उसके गालों को छूकर निकलती थी। उसके चेहरे पर एक नन्ही-सी मुस्कान चुपके से आ जाती है।


