दिया और नरम बातों का ऊन
आयु 3–5
जब दिया को पता चलता है कि बातें ऊन जैसी होती हैं — कुछ खुरदुरी, कुछ नरम — तो वह नरम और गुदगुदी बातें चुनना सीखती है, एक-एक प्यारी तारीफ़ के साथ।

दिया को गाँव के चौक वाला ऊन का ठेला बहुत पसंद था — नरम गोले, खुरदुरे गोले, हर रंग एक कतार में। “बातें ऊन जैसी होती हैं,” गोलू भेड़ ने कहा। “कुछ नरम होती हैं, कुछ खुरदुरी। फ़र्क़ महसूस करोगी?”
गोलू ने खुरदुरा स्लेटी गोला ऊपर उठाया, पुराने बगीचे के ब्रश जैसा काँटेदार। “बुरी बातें ऐसी चुभती हैं,” गोलू ने धीरे से कहा। दिया ने उसे छुआ और मुँह बना लिया। “आउच! ये तो बिल्कुल अच्छा नहीं है!”
फिर गोलू ने नरम गुलाबी गोला उठाया, रुई जैसा मुलायम और गरम। “प्यारी बातें ऐसी गुदगुदी और गरमाहट देती हैं,” गोलू ने कहा। दिया ने उसे सीने से लगा लिया। “नरम बातें, नरम बातें, लपेट लो चारों ओर! ये वाला तो मैं किसी को दे दूँगी!”


