अनन्या का गुप्त बगीचा और मीठे बोल
आयु 3–5
जब अनन्या को मुरझाते फूलों का एक छिपा हुआ बगीचा मिलता है, तो काई जैसा हरा बौना पिप्पू उसे सिखाता है कि सबको ऊँचा और खुश करने वाली चीज़ पानी नहीं, मीठे बोल हैं।

पुरानी पत्थर की दीवार के पीछे, हरी बेलों के परदे के उस पार, अनन्या को एक गोल-सा गुप्त बगीचा मिला, जिसके बारे में कोई और नहीं जानता था। वहाँ की हर कली नीचे झुकी हुई थी, फीकी और ऊँघती हुई। अनन्या बगीचे के किनारे ही रुक गई। उसने अपनी केतली जैसी झारी कसकर पकड़ रखी थी। अंदर जाने की हिम्मत अभी नहीं हो रही थी।
फव्वारे के पीछे से काई जैसा हरा एक नन्हा बौना उछलकर निकला। “मैं पिप्पू हूँ!” उसने दो बार कूदकर कहा। “पास आओ, दोस्त। इन फूलों को बस प्यारे, मीठे बोल चाहिए।” अनन्या ने एक छोटा-सा, हिम्मत वाला कदम आगे बढ़ाया।
गमले वाली मेज़ के पास अनन्या को एक छोटी-सी झुकी हुई कली दिखी। जल्दी-जल्दी में उसने झट से “शाबाश” कह दिया। कली बस थोड़ी-सी हिली, आधी-सी चमकी, और फिर ऊँघती हुई बैठ गई।


