अर्जुन और आराम वाला डिब्बा
आयु 3–5
जब घर में नन्हा बच्चा आता है और रोता ही रहता है, तो अर्जुन नर्सरी का पक्का "आराम का सरदार" बन जाता है। वह अनदेखा किए जाने की हल्की-सी चुभन को मज़ेदार मुँह, ठुमकेदार नाच और गुनगुनाने वाले गाने में बदल देता है, जो आख़िरकार घर में हँसी वापस ले आता है।

ऊँआँ-ऊँआँ! रोने की आवाज़ शहद-से सुनहरे हॉल में गूँज उठी। अर्जुन दरवाज़े पर ठिठक गया — क्या यहाँ उसकी कोई ज़रूरत भी है? घर में नन्हा बच्चा आया था और सब कुछ नया-नया लग रहा था। उसने अपने कंधे सीधे किए। “मैं कुछ न कुछ काम ढूँढ ही लूँगा!”
तभी अर्जुन को अपना लकड़ी का डिब्बा दिखा, जो शेल्फ़ पर रखा था। “मैं बनूँगा आराम का सरदार — सब सँभालूँगा मैं बारंबार!” डिब्बे में था एक झुनझुना, एक नरम-सा रुमाल, और एक छोटी-सी घंटी, जो चमकने को तैयार थी।
पहले उसने मज़ेदार मुँह बनाया — आँखें टेढ़ी, जीभ बाहर! बच्चे ने बस पलकें झपकाईं और होंठ बिचका लिए। उसने कान हिलाए और गाल फुलाए। फिर भी नन्ही-सी ठुड्डी काँपती रही।


