अर्जुन और खोई हुई रेसकार का रहस्य
आयु 3–5
जब अर्जुन की सबसे प्यारी लकड़ी की रेसकार लुढ़कते-लुढ़कते बगीचे की उलझी भूलभुलैया में खो जाती है, तो उसे सुराग़ों के पीछे-पीछे, पहियों के निशान-निशान चलकर उसे सही-सलामत घर लाना है।

अर्जुन को अपनी लकड़ी की रेसकार सबसे ज़्यादा पसंद थी। लाल पहिए, चिकनी और तेज़! वह बरामदे में फर्र-फर्र दौड़ती थी। तभी हवा का एक बड़ा झोंका आया और रेसकार लुढ़कने लगी, लुढ़कती गई, सीधे बगीचे की झाड़ी की तरफ़!
“रुको, लौट आओ!” पुकारता हुआ अर्जुन सीढ़ियों से दौड़ा। पर रेसकार तो ऊँची हरी झाड़ियों में गायब हो चुकी थी। उसने गहरी साँस ली। अब ध्यान से ढूँढ़ने का वक़्त है, जासूस बनने का वक़्त है, जो सुराग़ों के पीछे चलता है! निशान-निशान, सुराग़-सुराग़!
नारंगी रंग की फड़फड़ाहट! पिप्पू नाम की एक छोटी-सी रॉबिन चिड़िया पत्तों वाली डाली पर आकर बैठ गई और चहचहाने लगी। “चीं चीं! मैंने देखा है वह किधर गई!” क्या एक नन्ही चिड़िया सचमुच इतना बड़ा रहस्य सुलझाने में मदद कर सकती है?


