अर्जुन की नदी में नाव की सैर

आयु 3–5

अर्जुन एक उथली, धूप भरी धारा में अपनी नन्ही लकड़ी की नाव आज़माता है और जानता है कि तेज़ पानी दौड़ता है और धीमा पानी घूमता है। फिर वह सब्र के साथ लंबे डंडे वाले जाल से कागज़ की नन्ही नाव को घूमते भँवर से बचाता है, और पूरे समय उसके पैर किनारे पर ही रहते हैं।

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अर्जुन को सबसे ज़्यादा एक ही चीज़ पसंद थी: के बगीचे के पीछे वाली धारा में छोटी-सी नाव तैराना। आज उसने नाव को अपने झोले में रखा और रेतीली पगडंडी पर उछलता-कूदता चल पड़ा, खुशी के मारे उसके जूते चूँ-चूँ कर रहे थे।

“देखो, !” अर्जुन घास वाले किनारे पर घुटनों के बल बैठकर बोला। “पानी कितनी तेज़ बह रहा है!” उसके पास काई लगे तने पर बैठ गईं। “इसे बहाव कहते हैं, बेटा।”

अर्जुन ने लकड़ी की नाव को पानी पर रख दिया। सर्र! नाव धारा के बीच से फिसलती हुई आगे भाग गई। “अरे, ये तो दौड़ लगा रही है!” वह खुशी से तालियाँ बजाकर हँस पड़ा।

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