कबीर का सब्र वाला बगीचा
आयु 3–5
कबीर बगीचे में एक छोटा-सा बलूत का फल बोता है और अपनी हँसमुख लेडीबग दोस्त पिप के साथ चुपचाप बीतती सर्दी में वसंत के पहले हरे पत्ते का इंतज़ार करता है।

पतझड़ की हवा सुनहरे और लाल पत्तों को घुमा रही थी। कबीर को पुराने बलूत के पेड़ के नीचे छिपा एक छोटा-सा भूरा बलूत का फल मिला, चिकना और गोल। उसने आँखें बंद कीं और मन ही मन कहा, “उग आ, नन्हे बलूत, उग आ।”
एक छोटा-सा लेडीबग उसकी आस्तीन पर आ गिरा। “नमस्ते! मैं पिप हूँ!” वह चहका। “नन्हे बीज, नन्हे बीज, क्या तुम उगोगे?” कबीर मुस्कुराया। “चलो, साथ मिलकर देखते हैं, पिप।”
पत्ते की नक्काशी वाली अपनी खुरपी से कबीर ने नरम भूरी मिट्टी में एक छोटा-सा गोल गड्ढा खोदा। बलूत का फल उसमें रख दिया गया, गहरे और सुरक्षित, जैसे मिट्टी में लिपटा कोई राज़।


