आदित्य की छोटी-छोटी पक्की छलाँगें

आयु 3–5

खेल के मैदान की बड़ी पहाड़ी पर चढ़ने से पहले आदित्य को एक छोटी-सी अड़ियल समस्या सुलझानी है: जूते का फीता, जो बँधा नहीं रहता। एक नन्ही कोशिश उसे सिखाती है कि "मुझसे नहीं होगा" की जगह "मैं कोशिश करूँगा" कहना चाहिए।

"आदित्य की छोटी-छोटी पक्की छलाँगें" का कवर

आदित्य अपनी चमकदार नारंगी जैकेट और मज़बूत भूरे फीतेदार जूतों में लकड़ी की बेंच के पास घुटनों के बल बैठा था। "मुझसे जूते का फीता नहीं बँधता," उसने कहा और फीते को खींचकर ढीली-सी उलझी गुत्थी बना दी। "ये टिकता ही नहीं!"

"मुझसे नहीं होगा," ये बोल उसके मुँह से फीते की तरह ढीले-से निकल पड़े। आदित्य ने बेंच के पीछे वाली बड़ी हरी पहाड़ी की ओर देखा, जिस पर वह आज चढ़ना चाहता था। अचानक सब कुछ बहुत ही मुश्किल लगने लगा।

नेलू फुदककर आया और अपना रोएँदार सिर टेढ़ा करके बोला, "पूरी गाँठ एक साथ नहीं बाँधते," वह चहका। "बस एक छोटा-सा फंदा बनाओ। फिर एक छोटी-सी खींच। कोशिश तो करो!"

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