ईशान और खोई हुई पिल्ली की जासूसी का दिन

आयु 3–5

जब पार्क में ईशान को एक नन्ही-सी कूँ-कूँ सुनाई देती है, तो वह एक भरोसेमंद बड़े के साथ मिलकर सुराग ढूँढता है, डरे हुए पिल्ले को शांत करता है और उसे उसके खुश मालिक से मिलवा देता है।

"ईशान और खोई हुई पिल्ली की जासूसी का दिन" का कवर

ईशान कंकड़ वाली पगडंडी पर उछलता-कूदता चल रहा था। उसके जूते कुरकुर कर रहे थे और बिस्कुट का डिब्बा छन-छन बज रहा था। तभी — एक नन्ही-सी आवाज़ आई। “कूँ… कूँ…” “तुमने सुना?” ईशान ने फुसफुसाकर कहा। “कान लगाओ, नज़र घुमाओ — पिल्ला-जासूस ऐसे ही ढूँढ लेता है!”

“कूँ, कूँ,” आवाज़ फिर आई, किसी राज़ की तरह धीमी। ईशान की आँखें बड़ी-बड़ी हो गईं। “ये तो उस बड़ी झाड़ी से आ रही है! , चलिए, मेरे साथ देखिए — कान लगाइए, नज़र घुमाइए!”

ने ईशान का हाथ थाम लिया। “वाह, तुमने बहुत अच्छे से देखा! हम झाड़ियों में अकेले नहीं घुसते। यहीं रुककर साथ-साथ, आराम से झाँकते हैं।” वे झाड़ी से थोड़ी दूर, सुरक्षित जगह पर चुपचाप खड़े हो गए।

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