वीर का कबाड़ से बना शहर

आयु 3–5

जब वीर छिलकों, बोतलों और डिब्बों को आपस में मिला देता है, तो वह घबरा जाता है और ख़ुद को छोटा महसूस करता है — जब तक कि वह हर चीज़ को उसकी तस्वीर वाले डिब्बे से मिलाना नहीं सीख लेता और मोहल्ले का छँटाई वाला हीरो बनकर सबके लिए गत्ते का प्यारा-सा क़िला नहीं बना देता।

"वीर का कबाड़ से बना शहर" का कवर

ईंटों और धूप वाले एक आँगन में वीर को रंग-बिरंगा गंदा-संदा ढेर बहुत भाता था — डिब्बे, बोतलें और छिलके, अरे वाह! पर सब कुछ उल्टा-सीधा एक बड़े ढेर में पड़ा था। वीर एक छिलके पर फिसलते-फिसलते बचा और गाल फुलाकर बोला, “ये सब आख़िर जाएगा कहाँ?”

तभी पिप लुढ़कता हुआ आया। उसकी बोतल के ढक्कन वाली टोपी चमक रही थी और तार वाले हाथ हिल रहे थे। “बीप! हर खज़ाने का अपना एक घर होता है!” पिप ने कहा और तीन गोल कूड़ेदानों की ओर इशारा किया। उन पर शब्द नहीं, तस्वीरें बनी थीं: एक पत्ती, एक बोतल और एक काग़ज़ का पन्ना।

वीर ने छोटी-सी पत्ती को ग़ौर से देखा और चहककर बोला, “ये छिलकों के लिए है — मुझे पता है!” पिप ने बीप किया और तार वाले हाथों से ताली बजाई: “सही पकड़ा, वीर! बोतल का मतलब काँच और जग, और काग़ज़ के पन्ने का मतलब गत्ते के डिब्बे और कार्ड!” सही छाँटो, सुंदर छाँटो — छँटाई वाले हीरो की यही है ख़ुशी!

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