आध्या और बिना दीवारों वाला क़िला
आयु 3–5
जब आध्या पत्थर की धीमी मीनार का इंतज़ार करने से मना कर देती है, तो वह फ़ुट-रूल, ईंटें और गारा लेकर एक बिल्कुल नए तरह का क़िला बनाती है, जिसमें दीवारें ही नहीं हैं, बस खुली मेहराबें और खिलते बाग़ हैं, सबके लिए।

आध्या ने सौ दिनों तक इंतज़ार किया और पत्थर की मीनार को धीरे-धीरे, ईंट पर ईंट, ऊपर उठते देखा। “मुझे क़िला अभी चाहिए,” उसने कहा, “और मैं उसे खुद बनाऊँगी, झटपट-फटाफट!” फिर उसने अपना इंद्रधनुषी फ़ुट-रूल उठाया और शान से बाहर चल दी।
“क़िले को इंतज़ार कराने वाली दीवारें नहीं चाहिए,” आध्या ने अपना फ़ुट-रूल ज़मीन पर ठक-ठक-ठक बजाते हुए कहा। “बनाओ इसे खुला और आज़ाद! मेरे क़िले में फाटकों की जगह बाग़ होंगे, और ऐसे दरवाज़े जो हमेशा, हमेशा खुले रहेंगे।”
“तैयार हो, पिप?” आध्या ने पुकारा, और छोटी लाल गाड़ी ख़ुशी से चीं-चीं करने लगी। चीं-चीं-गड़गड़, डगमग-धप-लुढ़क, वे दोनों ईंटों के ढेर तक दौड़ पड़े, और पहिये बाग़ की पगडंडी पर उछलते-कूदते चले!


