आध्या की रंगों वाली धूप
आयु 3–5
एक उदास, धुँधली दोपहर में आध्या ब्रश उठाती है और जान जाती है कि धूप का सिर्फ़ इंतज़ार नहीं करना पड़ता, उसे बनाया भी जा सकता है।

खिड़की के शीशे पर बारिश टप-टप-टप करती रही। पूरा कमरा उदास और स्लेटी-सा हो गया था। आध्या ने खिड़की से अपनी नाक सटा ली और एक बहुत लंबी साँस भरी।
बिस्कुट ने धीरे से एक बार पलकें झपकाईं और पसरकर लेट गया। पूरा दिन ऐसी नींद जैसा लग रहा था जो कोई नहीं चाहता। आध्या ने आह भरी और बिस्कुट के पास बैठ गई।
तभी आध्या की नज़र पड़ी: शेल्फ़ पर रखा रंगों का एक टिन का डिब्बा, जैसे उसी का इंतज़ार कर रहा हो। “शायद,” वह फुसफुसाई, “मैं अपनी धूप खुद बना सकती हूँ, धूप, धूप।”


