मायरा और वो रोशनी जो डरती नहीं थी
आयु 3–5
जब रात में परछाइयाँ दैत्य जैसी लंबी हो जाती हैं और बाहर बादल गरजते हैं, तब मायरा अपनी भरोसेमंद टॉर्च उठाती है और सीखती है कि डरावने आकारों और धमाकेदार आवाज़ों को ऐसा खेल कैसे बनाया जाए जो उसके अपने काबू में हो। एक समझदार उल्लू वाली नाइट-लाइट उसका हौसला बढ़ाती रहती है।

हवा ने दरवाज़ा खटखटाया। बारिश टप-टप करने लगी। परदे की परछाईं दीवार पर लंबी और पतली हो गई, जैसे कोई नींद में डूबा दैत्य उठकर जम्हाई ले रहा हो। मायरा ने कंबल ठुड्डी तक खींच लिया और बिल्कुल चुप हो गई।
“हू-हू,” शेल्फ़ पर हल्की-हल्की चमकती उल्लू वाली लाइट बोस्को ने कहा। “परछाईं तो बस रोशनी होती है, जिसके रास्ते में कुछ आ गया हो। देखोगी?” मायरा ने कंबल से बाहर झाँका। अब वह सिमटी हुई नहीं थी, उसे जानने की उत्सुकता थी।
मायरा को मोटी-सी टॉर्च मिल गई, जिस पर लाल रबर का छल्ला लगा था। क्लिक! उसने रोशनी सीधे परदे पर डाली, और दैत्य का राज़ खुल गया: वह तो बस कपड़ा था, जो हवा में झूल रहा था। “जला दो रोशनी, मायरा!” उसने खुश होकर कहा।


