अर्जुन और आसमानी विशालकाय की बादल-बेकरी
आयु 3–5
जब सुबह के कोहरे में से एक चाँदी की सीढ़ी नीचे उतरती है, तो अर्जुन बादलों में चढ़कर एक भले आसमानी दैत्य की मदद करता है। सूरज निकलने से पहले वे दिन के बादल बनाते हैं और आटे को नावों और पिल्लों की शक्ल देते हैं।

किसी ने अर्जुन का कंबल प्यार से ओढ़ा दिया, नरम और गरम। फिर चुपके से, श्श्श! कोहरे में से एक चाँदी की सीढ़ी लहराती हुई नीचे आई। अर्जुन ने अपना फेंटने वाला चम्मच कलाई पर बाँधा और धीरे से बोला, "चलो ऊपर चढ़ें, चलो ऊपर चढ़ें!"
सीढ़ी के एक-एक डंडे पर वह ऊपर चढ़ता गया। ऊँघते हुए पंछियों के पास से, बड़े-बड़े आसमान के पास से। चलो ऊपर चढ़ें, चलो ऊपर चढ़ें, बादल लगे सुबह की गरम-गरम पूरी जैसे नरम!
ऊपर पहुँचते ही एक विशालकाय ने छींका, आआछी! बादलों की रुई जैसी फुहार सफ़ेद बर्फ़ की तरह उड़ गई। "अरे मेरे बादलो!" वह धीमे से आह भरकर बोला। "ये कोई शक्ल ही नहीं लेते। ये कहीं जाते ही नहीं।"


