कबीर और नन्हा छींकू ड्रैगन
आयु 3–5
जब कबीर को एक जेब जितना छोटा ड्रैगन मिलता है, जिसकी छींकें नन्ही सुनहरी चिंगारियों में बदल जाती हैं, तो वह बेचारे पेपर की छींकें ठीक करने के लिए इलाज की एक टोकरी भर लेता है। कोई इलाज काम नहीं करता, और पेपर हर छींक के बाद माफ़ी माँगता है। फिर बगीचा अँधेरा और नीला हो जाता है, और कबीर का झिलमिल विचार द

एक हवादार सुबह कबीर को रसोई की खिड़की पर एक चाय का प्याला दिखा। उसके अंदर कुछ खर्राटे ले रहा था। कुछ हरा-हरा। कुछ छोटा-सा। कुछ ऐसा जिसके... पंख थे!
अरे, यह तो ड्रैगन था! एक नन्हा ड्रैगन, इतना छोटा कि जेब में आ जाए! “मैं पेपर हूँ,” उसने शरमाते हुए कहा। उसकी नाक फड़की। उसकी नाक हिली। “आ... आ... आ-छीं!” और नन्ही चमकीली चिंगारियाँ उड़ चलीं! “जीते रहो!” कबीर ने कहा। “माफ़ करना!” पेपर चीं-चीं करके बोला।
चिंगारियाँ धीरे-धीरे नीचे तैरती आईं। वे गुदगुदी करती थीं, जैसे धूप की बनी बर्फ़ की नन्ही-नन्ही फुहारें हों। “असली ड्रैगन तो ऊँचा उड़ते हैं और ज़ोर से दहाड़ते हैं,” पेपर ने नाक सुड़कते हुए कहा। “पर मैं जब भी कोशिश करता हूँ... छींक आ जाती है और मैं लुढ़क जाता हूँ।”


