कबीर और क्रिस्टल घाटी की गाती हुई रेलगाड़ी
आयु 3–5
जब कबीर को एक जादुई गाने वाली रेलगाड़ी का खास इंजन ड्राइवर चुना जाता है, तो वह जानता है कि उसकी घोंघे के खोल वाली सीटी की हर टूट एक जगमगाती क्रिस्टल घाटी से मीठा संगीत जगा देती है।

पहाड़ियों के नीचे, गहरे में, जहाँ चट्टानें गुलाबी और बैंगनी चमकती हैं, एक छोटी-सी गोल रेलगाड़ी खड़ी थी। उसकी भाप गुनगुन करती हुई ऊपर उठ रही थी। “आओ, सवार हो जाओ कबीर!” बूढ़े फेरो दादा ने मुस्कुराकर पुकारा। “आज तुम हमारे इंजन ड्राइवर हो! चलो, संगीत शुरू करें!”
कबीर अंदर चढ़ा और गोल खिड़की के पास बैठ गया। घोंघे के खोल वाली सीटी उसके सीने से लगकर गरम-गरम लग रही थी। चूहा पिप, जो गाड़ी का गार्ड था, चीं-चीं करता हुआ उछलकर आया। “तैयार हो, नन्हे इंजन ड्राइवर? छुक-छुक, कोई धुन चुनो!” कबीर ने सिर हिलाया, उसकी आँखें चमक रही थीं।
कबीर खिड़की के पास बैठा और उसने सीटी बजाई। पों! ...पर कुछ नहीं हुआ। न कोई घंटी बजी, न कोई चमक जागी। उसने गहरी साँस ली, कान लगाकर सुना और धीरे-धीरे फिर कोशिश की।


