आदित्य और आधी रात की खिलौनों वाली नाच-पार्टी

आयु 3–5

जब दादाजी वाली बड़ी घड़ी में आधी रात का घंटा बजता है, तो आदित्य के खिलौनों का संदूक चर्र से खुल जाता है और अंदर एक जगमगाता नाच-घर दिखता है, जहाँ सारे प्यारे खिलौने ज़िंदा होकर उसे शुक्रिया कहते हैं।

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टिक-टॉक, टिक-टॉक, ऊँची घड़ी की घंटी बजी। आधी रात का समय था, और आदित्य बिस्तर पर उठकर बैठ गया, उसकी नींद पूरी तरह उड़ गई थी। खेल वाले कमरे के दरवाज़े के नीचे से सुनहरी रोशनी की एक पतली-सी लकीर झाँक रही थी। वह बिस्तर से उतरा, यह देखने के लिए कि वहाँ कौन-सा जादू छिपा है।

चर्रर्रर्र... खिलौनों वाले संदूक का ढक्कन धीरे-धीरे खुला, धीमी और गहरी आवाज़ के साथ। आदित्य बादल जैसी नरम चप्पलें पहने दबे पाँव पास गया। रिबन में बँधी छोटी-सी पीतल की चाबी छन-छन करती रही। संदूक के अंदर कुछ सुनहरा चमक रहा था, जैसे कोई उसे देखने का इंतज़ार कर रहा हो।

बाहर आया कैप्टन बटन्स, खट-खट करता हुआ, सीधा तनकर खड़ा। उसने लकड़ी की एड़ियाँ खटाक से टकराईं और आदित्य को कड़क सलामी दी। “नाच-घर तैयार है, नन्हे दोस्त! क्या तुम भी मेरे साथ चलोगे?”

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