सिया का आसमान छूता बादल वाला झूला
आयु 3–5
जब सुबह की रोशनी पहाड़ियों पर बिखरती है, तो सिया धूप की किरणों की रस्सियों और एक गोल-मटोल गुलाबी बादल से एक झूला बनाती है, और जब आसमान में ऊँचाई पर एक रस्सी ढीली हो जाती है, तो उसकी अपनी समझदारी सब सँभाल लेती है।

सुबह धीरे से आई, सुनहरी-सुनहरी, शहद की तरह रोशनी बिखेरती हुई। सिया एक तैरते हुए द्वीप पर जागी, और उसे लगा जैसे आसमान उसे बुला रहा है। आज वह कुछ बहुत सुंदर बनाने वाली थी।
“मैं एक झूला बनाऊँगी,” सिया ने कहा, “ऐसा झूला जो बादलों को छू ले!” पास में धूपी आँखें झपकाकर जागी, चमचम चमकती हुई। “तैरती हुई सीट, धूप की रस्सी, चलो चलो, शुरू हो मस्ती!” वह खनकती आवाज़ में बोली।
सबसे पहले रस्सियाँ बनीं, धूप की किरणों की, गरम और मज़बूत। सिया ने हाथ बढ़ाकर रोशनी समेट ली और उसे सुनहरे धागे की तरह गोल-गोल लपेटती गई।


