पीहू और हंस पेरला का सुनहरा पंख

आयु 3–5

जब एक घमंडी-सी हंस पेरला का ताज घाट के पास सरकंडों में जा गिरता है, तो पीहू एक बड़े के पास रहते हुए उसे निकालने की बार-बार कोशिश करती है, और बदले में एक चमकती दोस्ती पाती है।

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फुसफुसाती झील के पास, जहाँ ऊँचे सरकंडे झूमते हैं, पीहू पगडंडी पर उछलती-कूदती चली, सुनहरे दिन की धूप में। “आज वहाँ क्या मिलेगा?” वह सोचकर बोली। उसका जाल हौले-हौले झूल रहा था, और बूटों की धप-धप ज़मीन पर गूँज रही थी।

छपाक! फड़-फड़! एक बड़ा-सा सफ़ेद हंस पानी में गोल-गोल घूम रहा था, ठीक से तैर नहीं पा रहा था। “अरे नहीं,” पीहू बोली, “कुछ तो गड़बड़ है, मुझे पता है!” हंस पेरला ने सिर टेढ़ा किया, जैसे कोई छोटी-सी घंटी चिंता में बज उठी हो।

“मेरा ताज!” पेरला धीरे से बोली, “छपाक से गिरा और सरकंडों में जा फँसा, अब निकलता ही नहीं!” पीहू ने पानी में झाँका, जहाँ सुनहरी रोशनी चमक रही थी, हरे सरकंडों में उलझी, जैसे कोई छोटा-सा उलझा हुआ सपना।

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