मायरा और इंद्रधनुष बुनने वाली मीरा का करघा
आयु 3–5
जब मायरा बादलों की कार्यशाला में पहुँचती है, तो एक कोमल बुनकर उसे सिखाती है कि बारिश की बूँदों और धूप की किरणों के धागों से घाटी के लिए चमकदार दोहरे इंद्रधनुष कैसे बुने जाते हैं।

घाटी के बहुत ऊपर, जहाँ बादल धीरे-धीरे घुमड़ते हैं, रंगों से भरी एक छोटी-सी कारख़ाने जैसी जगह थी, जहाँ धागे जैसे जगमगाते थे। मायरा धुँध की सीढ़ियाँ चढ़ती गई, उत्सुक और चमकती आँखों वाली, यह देखने कि हर रात आसमान में इंद्रधनुष कौन बुनता है।
“आओ, आओ!” मीरा बोली, उसकी सलाइयाँ पास ही खटखट कर रही थीं। “मैं इंद्रधनुष बुनने वाली हूँ, और मैं यहाँ तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी। क्या तुम मेरी कला सीखोगी, यह पुरानी, सच्ची बुनाई — ऊपर, नीचे, चटकीले रंग, और बन जाए तुम्हारा अपना इंद्रधनुष?”
मीरा ने एक छोटी-सी ढरकी निकाली, जो अबाबील के पंख जैसी गढ़ी थी। “यह अब तुम्हारी है, प्यारी बच्ची, हर काम की साथी। ऊपर, नीचे, ऊपर, नीचे — यही है बुनाई का गीत। मेरे साथ गाओ, मायरा, और करघे में धागे चढ़ाते चलो!”


