अर्जुन और घंटाघर की रहस्यमयी ख़ामोशी
आयु 6–8
जब कस्बे का प्यारा घंटाघर दोपहर में बजना बंद कर देता है, तो अर्जुन आवर्धक काँच और नोटबुक लेकर घुमावदार सीढ़ियाँ चढ़ता है और एक-एक सुराग़ जोड़कर मामला सुलझाता है।

रोज़ दोपहर बारह बजे घंटाघर पूरे चौक में गूँज उठता था — टन, टन, टन! पर आज कुछ नहीं। बस सन्नाटा। दुकानदारों ने ऊपर देखा। कबूतर घबराकर इधर-उधर उड़ गए। “अरे, ये तो अजीब बात है,” अर्जुन ने अपने आवर्धक काँच पर हाथ रखकर कहा। “घड़ियाँ यूँ ही बिना वजह बंद नहीं होतीं।” पॉकेट्स ने एक बार भौंककर जैसे पूरी तरह हामी भर दी।
“सुना है घड़ी के पुर्ज़े हमेशा के लिए टूट गए हैं,” अपने फल के ठेले से बूढ़े टिब्बू चाचा ने फुसफुसाकर कहा। अर्जुन ने सिर हिलाया। “अभी हमें ये पता नहीं है। पहले हम देखेंगे।” उसने अपनी छोटी चमड़े की नोटबुक निकाली और लिखा: दोपहर। घंटा नहीं बजा। क्यों? पॉकेट्स घंटाघर के भारी लकड़ी के दरवाज़े को सूँघने लगा, उसकी पूँछ तेज़ी से हिल रही थी।
दरवाज़ा चरमराकर खुला, तो अंदर एक घुमावदार सीढ़ी दिखी जो अँधेरे में ऊपर चली गई थी। “सँभलकर,” एक आवाज़ आई — ये सुमित्रा मैडम थीं, कस्बे की घड़ीसाज़, जिनकी औज़ारों की पेटी खनक रही थी। “अंदर किसी चीज़ ने मेरे पुर्ज़ों को एकदम रोक दिया है। पता लगाने में मेरी मदद करोगे?” अर्जुन की आँखें चमक उठीं। “इसीलिए तो मैं अपना आवर्धक काँच लाया हूँ।”


