कबीर और सात चाबियों की पहेली
आयु 6–8
जब धूल भरे अटारी के संदूक़ के साथ सात बेमेल लोहे की चाबियाँ मिलती हैं, तो कबीर को लैम्प की रोशनी में हर चाबी की बनावट पढ़कर सही चाबी ढूँढनी है, इससे पहले कि पूरा रहस्य हमेशा के लिए खो जाए।

पुरानी अटारी में काग़ज़ और बीते वक़्त की महक थी। एक गर्मजोशी भरी आवाज़ ने कहा, “यह संदूक़ पचास साल से नहीं खुला है। अगर कोई चाबी अटक जाए और ग़लत ज़ोर लग जाए, तो पुराना ताला हमेशा के लिए जाम हो सकता है। जो चाबी सचमुच इसमें फिट बैठेगी... अंदर का ख़ज़ाना तुम्हारा है, कबीर।” वह मुस्कुरा उठा। सात चाबियाँ। और ताला सिर्फ़ एक।
“अरे वाह, पहेली!” एक चीं-चीं करती आवाज़ आई। अटारी का चूहा टिन्नू एक पुरानी पेटी के पीछे से निकल आया, उसका लाल धागे का मफ़लर हिल रहा था। “सात चाबियाँ, एक छेद। मुझे तो चाबी के छेद बहुत पसंद हैं!” कबीर सरसों जैसी पीली बुनी हुई सदरी और मुड़ी आस्तीनों वाली क़मीज़ पहने संदूक़ के पास घुटनों के बल बैठ गया। “पहले देखो। फिर चुनो,” उसने कहा।
कबीर ने सरसों-पीली सदरी और कॉरडरॉय की पैंट पहने हुए मैग्निफ़ाइंग ग्लास चाबी के छेद के पास उठाया और उसके किनारों को ध्यान से देखा। वह सिर्फ़ गोल छेद नहीं था। अंदर छोटे-छोटे खाँचे निकले हुए थे, जैसे कोई नन्ही भूलभुलैया। “ये उभार ताले की अड़चनें हैं,” वह धीरे से बोला। “चाबी को हर एक से मिलना होगा।”


