वीर और झील की रोशनी का कोड
आयु 6–8
जब वीर के कैंप की झील के उस पार एक रहस्यमयी रोशनी टिमटिमाने लगती है, तो वो बिंदुओं और डैशों के उसके पैटर्न को एक-एक झलक ध्यान से पढ़कर समझता है कि बुला कौन रहा है और क्यों।

अलाव की आग धीमे-धीमे चटक रही थी। वीर अपनी हरी ज़िप वाली जैकेट और भूरी-सफ़ेद धारियों वाली कमीज़ पहने, लकड़ी के धुएँ की महक में लिपटा बैठा था। उसकी गोद में नोटबुक खुली थी। काली झील के उस पार कुछ टिमटिमाया। एक बार। दो बार। “रेंजर मूंगा,” वीर ने धीरे से कहा, “उस किनारे की वो रोशनी जुगनू नहीं है। वो जानबूझकर जल-बुझ रही है।”
“अपनी नोटबुक उठाओ और पानी के पास आ जाओ,” रेंजर मूंगा ने कहा और अपनी रस्सी का गोला कंधे पर डाल लिया। वो वीर को, जो अब भी अपनी हरी ज़िप वाली जैकेट और भूरी-सफ़ेद धारियों वाली कमीज़ में था, रेतीली पगडंडी से घाट तक ले गईं। “इस झील की कुछ रोशनियाँ बातें करना पसंद करती हैं। बस तुम्हें आँखों से सुनना सीखना होगा।”
घाट के सिरे पर वीर, अपनी हरी जैकेट में, घुटनों के बल बैठ गया और रोशनी को फिर से देखने लगा। छोटी। छोटी। लंबी। “ये यूँ ही नहीं है,” उसने कहा, और उसकी पेंसिल तेज़ी से चलने लगी। “छोटी और लंबी झलकियाँ, जैसे बिंदु और डैश। छोटी, छोटी, लंबी, इसका क्या मतलब है? रेंजर मूंगा, मुझे लगता है ये मोर्स कोड है!”


