कबीर और धूपघड़ी की पहेली
आयु 6–8
जब बगीचे की धूपघड़ी और सबकी कलाई की घड़ियाँ पूरे एक घंटे का अलग समय बताती हैं, तो कबीर एक आवर्धक काँच और नोटबुक लेकर घड़ी के समय और सूरज के समय का रहस्य सुलझाने निकल पड़ता है।

“पिप, देखो!” कबीर पुरानी पत्थर की धूपघड़ी के पास झुककर बैठ गया। उसकी नोटबुक तैयार थी। परछाईं तीन बजे पर थी, पर उसकी कलाई की घड़ी साफ़ शाम के चार बजा रही थी। “ये ठीक नहीं है,” वह फुसफुसाया। “इस बगीचे में कुछ अजीब हो रहा है।”
पीली जैकेट चमकाती हुई बाड़ के ऊपर से कूदकर आई। “क्या धूपघड़ी ख़राब हो गई?” उसने पूछा। “या फिर,” कबीर ने आँखें फैलाकर कहा, “किसी ने समय को ही मोड़ दिया?” पिप भौंका, जैसे वह भी मान रहा हो कि कुछ अजीब-सा रहस्य चल रहा है।
“अंदाज़े मत लगाओ, नापकर देखते हैं,” कबीर ने कहा और धूपघड़ी की सुई की परछाईं के पास घुटनों के बल बैठ गया। उसने उसके बगल में मिट्टी में एक सीधी लकड़ी गाड़ दी। “अगर सूरज एक रफ़्तार से चलता है, तो परछाईं को बाहर की हर घड़ी से मेल खाना चाहिए… है ना?”


