आदित्य और गुलाब की भूलभुलैया का कंपास
आयु 6–8
जब आदित्य और उसके दो दोस्त बाग़ के मेले की गुलाब की ऊँची झाड़ियों वाली भूलभुलैया में खो जाते हैं, तो वह अपने लकी कंपास को कसकर थामता है और मोड़ गिन-गिनकर फ़व्वारे तक पहुँचता है, और घबराहट की जगह एक योजना से अपने दोस्तों को शांत रखता है।

बाग़ के मेले में संगीत बज रहा था और हँसी गूँज रही थी, पर सबसे बड़ा आकर्षण था गुलाब की झाड़ियों वाली भूलभुलैया — किसी भी बड़े से ऊँची और पत्तों से घनी। “बीच वाले फ़व्वारे तक दौड़ लगाते हैं!” आरव ने कहा। आदित्य मुस्कुराया। उसने डोरी में बँधे छोटे पीतल के कंपास को कसकर पकड़ा और दौड़कर अंदर घुस गया। सोनल और आरव ठीक उसके पीछे थे।
वे पहले बाएँ मुड़े, फिर दाएँ, फिर दोबारा बाएँ। हर मोड़ पर वे खिलखिला रहे थे। पर जल्दी ही सारे रास्ते एक जैसे दिखने लगे — हरी दीवार, हरी दीवार, हरी दीवार। “रुको,” सोनल अचानक ठिठक गई। “हम अभी किस तरफ़ से आए थे?” किसी को याद नहीं था। हँसी धीरे-धीरे चुप्पी में बदल गई।
आरव का होंठ काँपने लगा। “हम खो गए हैं! सच में खो गए हैं!” सोनल ने अपनी धूप वाली टोपी सीने से चिपका ली। आदित्य को अपना दिल धक-धक करता सुनाई दिया — ज़ोर से, तेज़ और डरा हुआ। तभी उसकी उँगलियों को डोरी में बँधा छोटा कंपास मिल गया, गर्म और ठोस। उसने एक लंबी साँस ली।


