वीर और सुनहरे बैज की खोज
आयु 6–8
जब शहर की सौवीं सालगिरह की खज़ाने की खोज में पाँच रहस्यमय सुराग पूरे मोहल्ले में बिखर जाते हैं, तो वीर को पहेलियाँ, पैरों के निशान और भूले-बिसरे काग़ज़ के टुकड़े जोड़कर एक सही जवाब निकालना है, ताकि वह जासूस का सम्मानित बैज जीत सके।

पूरा शहर सौवीं सालगिरह की झंडियों से सजा था। बैंड-बाजे की धुन गूँज रही थी और बेकरी से ताज़ी रोटी की गर्म खुशबू आ रही थी। भीड़ के ऊपर एक आवाज़ गूँजी, “सौ साल के राज़ पाँच सुरागों में छिपे हैं। सब हल कर लो, तो पुराना टाइम कैप्सूल खुल जाएगा!” वीर ने सरसों-पीले रंग का ट्रेंच कोट पहना था और लाल चेक वाली टोपी माथे से पीछे सरकाई हुई थी। उसने अपना पीतल का आतिशी शीशा कसकर पकड़ लिया। “हर सुराग ज़रूरी होता ह
“पहला सुराग: रेलवे स्टेशन!” नेहा ने अपनी कॉपी से पढ़ा और पन्ने पर उँगली ठकठकाई। प्लेटफ़ॉर्म पर वीर को एक बेंच के नीचे आधा छिपा, मुड़ा-तुड़ा काग़ज़ का टुकड़ा दिखा। “ट्रेन का टिकट,” वह बोला और बिना दस्ताने वाली उँगलियों से उसे ध्यान से पलटकर देखने लगा। “पर यह आया कहाँ से, और यहाँ क्यों पड़ा है?” बिस्कुट ने उसे दो बार सूँघा और ज़ोर से भौंका।
पार्क में फूलों की क्यारियों के पास बिस्कुट नाक झुकाए इधर-उधर दौड़ रहा था। फिर वह कुचली हुई पंखुड़ियों के पास अचानक रुक गया। “पैरों के निशान!” नेहा बोली और उँगली से उनकी बनावट छूकर देखी। उनके पास मिट्टी में आधा दबा, एक छोटा-सा घिसा हुआ कुत्ते का पट्टा चमक रहा था। वह बिस्कुट का नहीं था। वीर झुककर सब कुछ ध्यान से देखने लगा। “यहाँ किसी और का कुत्ता भी आया था,” वह बोला। “यह दूसरा सुराग है, और साथ में


