सान्वी और गायब हुई बैले चप्पलों का रहस्य
आयु 6–8
बैले शो से ठीक एक घंटा पहले जब मुख्य नर्तकी की गुलाबी साटन की चप्पलें गायब हो जाती हैं, तो सान्वी को पर्दा उठने से पहले पोशाकों की रैकों की भूलभुलैया में अटके रेशमी धागों के रास्ते पर चलकर उन्हें ढूँढना है।

“एक घंटे में सब अपनी जगह पर!” पंकज सर ने आवाज़ लगाई, और स्टेज के पीछे का गलियारा मधुमक्खियों के छत्ते की तरह भनभनाने लगा। तभी मारिसोल ड्रेसिंग रूम से दौड़ती हुई निकली, उसकी आँखें फटी हुई थीं। “मेरी चप्पलें गायब हैं! मेरी गुलाबी साटन की चप्पलें! उनके बिना मैं नाच ही नहीं सकती!” सान्वी अपने जूते के फ़ीते बाँध रही थी। उसने सिर उठाकर देखा। एक रहस्य! उसे तो यही सबसे ज़्यादा पसंद था।
“घबराओ मत,” सान्वी ने कहा और अपना पीतल का आतिशी शीशा निकाल लिया। “हर रहस्य अपने पीछे सुराग छोड़ जाता है।” वह उस मेज़ के पास झुकी जहाँ चप्पलें हमेशा रखी रहती थीं। जगह खाली थी, लेकिन मेज़ के किनारे पर कुछ गुलाबी और चमकीला-सा अटका हुआ था। एक अकेला धागा, फुसफुसाहट जितना पतला।
“रेशम का रेशा!” सान्वी बोली। “साटन के फ़ीते का, बिलकुल तुम्हारी चप्पलों जैसा।” मारिसोल झुककर देखने लगी। “तो यह हमें कहाँ ले जाएगा?” सान्वी ने धागे की दिशा में नज़र दौड़ाई। वह ड्रेसिंग रूम के दरवाज़े से बाहर, पोशाकों की रैकों की ऊँची, धुँधली परछाइयों की ओर जा रहा था। “पता लगाने का बस एक ही तरीका है। हम इसके पीछे चलेंगे।”


