मायरा और बदली हुई कप्तान की तस्वीर

आयु 6–8

शहर की बड़ी आर्ट गैलरी की स्कूल-यात्रा पर तेज़ नाक वाली मायरा एक ऐसा सुराग सूँघ लेती है जो किसी और को नहीं दिखा, और नक़ली चित्रकार का तस्वीर बदलने का राज़ हमेशा के लिए छिप जाए, उससे पहले उसे हिम्मत करके सच बोलना है।

"मायरा और बदली हुई कप्तान की तस्वीर" का कवर

“तीसरा खंड, बच्चो! यहाँ हमारे सबसे पुराने खज़ाने रखे हैं!” नीना मैडम ने कहा और बच्चों को गूँजते संगमरमर वाले लंबे गलियारे में ले चलीं। मायरा उछलती-कूदती सबसे आगे चल रही थी। हरी डोरी में लटकता उसका मैग्निफ़ाइंग ग्लास झूल रहा था और हर सुनहरे फ्रेम को देखकर उसकी आँखें फैल जाती थीं। इस सैर में कुछ तो ख़ास था। मोड़ के उस पार कौन-से खज़ाने इंतज़ार कर रहे होंगे?

सब एक बहुत बड़ी तस्वीर के सामने रुक गए। उसमें एक सख़्त चेहरे वाले बूढ़े समुद्री कप्तान थे। तस्वीर 1850 में बनी थी। “मुझे यह तस्वीर सबसे ज़्यादा पसंद है,” नीना मैडम ने गर्व से कहा। मायरा पास झुकी और डोरी से मैग्निफ़ाइंग ग्लास उठाकर कप्तान की रंगी हुई आँखों को ग़ौर से देखने लगी। तस्वीर की किसी बात ने उसकी जिज्ञासा जगा दी थी, पर वह बात क्या थी?

तभी मायरा ने नाक सिकोड़कर सूँघा। “अरे... इसमें से रंग की महक आ रही है,” वह फुसफुसाई। “ताज़े रंग की।” ने भी नाक सिकोड़ी। “पुरानी तस्वीरों से तो ऐसी महक नहीं आती, है ना?” मायरा ने धीरे से सिर हिलाया, उसकी चोटियाँ झूल गईं। “गीला रंग झूठ नहीं बोलता,” वह अपने आप से बुदबुदाई। कप्तान की तस्वीर में कुछ तो गड़बड़ थी।

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