ईरा और फुसफुसाता फ़व्वारा
आयु 6–8
जब पुराने पार्क का फ़व्वारा चुप हो जाता है, तो ईरा को पुराने पाइपों के नक़्शे पढ़ने होंगे, पानी के बहाव का हिसाब लगाना होगा, और रखवाली करने वाले रमेश चाचा को ठीक-ठीक बताना होगा कि कौन-सा वाल्व घुमाना है, इससे पहले कि पूरे पार्क की पानी वाली पार्टी बिगड़ जाए।

फुसफुसाता फ़व्वारा चुप हो गया था। न छप-छप, न फुहार, एक बूँद तक नहीं। ईरा सूखे पत्थर के कटोरे के सामने खड़ी थी। उसके गले में आतिशी शीशा झूल रहा था। “चुप फ़व्वारा,” वह धीरे से बोली, “यानी फ़व्वारे में कोई राज़ छिपा है।” रमेश चाचा ने सिर खुजलाया। “तीन बार ठीक कर चुका हूँ। कुछ भी काम नहीं करता!”
“हर फ़व्वारे के नीचे पाइप होते हैं, नसों की तरह,” ईरा ने अपने आतिशी शीशे से ठुड्डी थपथपाते हुए कहा। “अगर पानी बाहर नहीं आ रहा, तो अंदर कहीं कुछ अटका है।” पिप ने चोंच खटखटाई और फड़फड़ाकर पुरानी पीतल की नक़्शे वाली तख्ती पर जा बैठा, जैसे रास्ता दिखा रहा हो।
रमेश चाचा सुरक्षा-रेलिंग के पीछे एक गोल लोहे के ढक्कन के पास घुटनों के बल बैठे और उसे चरमराकर खोला। ठंडी हवा ऊपर आई, जिसमें ताँबे और बारिश की महक थी। “यह वाल्व वाली कोठरी है,” उन्होंने बताया। “नीचे जाने के लिए जगह बहुत तंग है, पर मैं झाँककर देख सकता हूँ।” ईरा निशान वाली रेखा के पीछे ही खड़ी रही। “तो मैं ऊपर से आपकी आँखें बन जाती हूँ!”


