ईरा और वह रज़ाई जिसे सब याद था

आयु 6–8

जब ईरा को फ़र्श के एक ढीले तख़्ते के नीचे लकड़ी के डिब्बे में एक पुराना काग़ज़ी नक्शा मिलता है, तो उसे समझ आता है कि उसके परिवार की विरासत वाली रज़ाई असल में आँगन के पार घाटी में छिपे एक पुराने बसेरे का नक्शा है।

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“यह रज़ाई तुम्हारी परदादी की माँ की थी,” दादी इफ़ी ने सिलाई वाले कमरे के फ़र्श पर उसे बिछाते हुए कहा। ईरा झुककर पास से देखने लगी। उसकी पीतल की मैग्निफ़ाइंग ग्लास डोरी में झूल रही थी। तिकोन कतारों में ऐसे सजे थे जैसे छोटे-छोटे हंस उड़ते जा रहे हों। “रुकिए,” उसने धीरे से कहा, “हंस तो हर बार एक ही तरफ़ उड़ते हैं। कहीं ये तिकोन भी किसी तरफ़ इशारा तो नहीं कर रहे?” “रज़ाइयों को बहुत कुछ याद रहता है,” दा

खिड़की के पास का एक तख़्ता ईरा के घुटने के नीचे हिलने लगा। ने दरार को सूँघा और कूँ-कूँ करने लगा, उसकी पूँछ तेज़ी से हिल रही थी। ईरा ने सँभालकर उँगलियों से तख़्ता ऊपर उठाया। नीचे एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा रखा था, धूल से भरा, पर सूखा। “, देखो!” उसने फुसफुसाकर कहा। उसका दिल ढोल की तरह धक-धक कर रहा था।

डिब्बे के अंदर एक पुराना काग़ज़ी नक्शा रखा था, थोड़ा सिकुड़ा हुआ और किनारों पर नरम। एक तरफ़ हल्के-हल्के अंक कतार में लिखे थे, किसी दिशा-सूचक की तरह। “यह सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है,” ईरा ने आँखें फैलाकर कहा। “यह तो रास्ता बताता है! दादी इफ़ी, देखिए!” मेज़ के पास से दादी के हाथ आगे बढ़े और नक्शे को सीधा करके बिछा दिया। “तुम्हारी परदादी की माँ ने यह रज़ाई इसी नक्शे से बनाई थी।”

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