कमरा नंबर 4 का ग़ायब खरगोश
आयु 6–8
जब कमरा नंबर 4 का पालतू खरगोश पिंजरे से गायब हो जाता है, तो नन्ही जासूस सान्वी कुतरे हुए सलाद के टुकड़ों, काग़ज़ की कतरनों और छोटे-छोटे सुराग़ों के सहारे पूरी कक्षा में उसका पीछा करती है, और उसे उसी जगह सुरक्षित और ऊँघता हुआ पाती है, जहाँ किसी ने देखने की सोची ही नहीं थी।

सोमवार की सुबह क्रेयॉन और नए काग़ज़ की ख़ुशबू से महक रही थी। सान्वी उछलती-कूदती पढ़ने वाले कोने में पहुँची, ताकि खरगोश पिप्पू को गुड मॉर्निंग कह सके। लेकिन पिंजरे का दरवाज़ा खुला था और धीरे-धीरे हिल रहा था। “पिप्पू ग़ायब है!” सान्वी हैरानी से बोली। सरसों-पीले रंग की स्वेटर-बनियान पहने के हाथ से पेंसिल छूट गई। “हमें एक जासूस चाहिए,” वह बोला। सान्वी ने अपना मैग्निफ़ाइंग ग्लास उठाया। “अच्छा है कि तुम
“ध्यान से देखो, आराम से सोचो। जासूस ऐसे ही काम करते हैं,” सान्वी ने पिंजरे के पास घुटनों के बल बैठकर कहा। उसे फ़र्श की टाइलों पर हरे-हरे छोटे टुकड़े बिखरे दिखे। “सेलरी के टुकड़े!” ने अपनी कॉपी में कुछ लिखा। उसका चश्मा नाक पर फिसल रहा था। “पिप्पू को सेलरी बहुत पसंद है। शायद उसने रास्ते में निशान छोड़े हों!” सान्वी मुस्कुराई। “तो चलो, इन्हीं के पीछे चलते हैं।”
सेलरी के टुकड़ों का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा चलता गया। वह कला वाली मेज़ के पास से गुज़रा, उन बोतलों और जारों के पास से, जिनसे गोंद और गीले रंग की गंध आ रही थी। सान्वी पंजों के बल चल रही थी, ताकि कोई सुराग़ पैरों तले न आ जाए। अपनी कॉपी को स्वेटर-बनियान से सटाए उसके पीछे-पीछे चल रहा था। फिर टुकड़े ख़त्म हो गए, ठीक किताबों की अलमारी की लंबी परछाईं के किनारे पर।


