सिया और चुप घंटियों का रहस्य
आयु 6–8
जब हवा वाली दोपहर में बरामदे की घंटियाँ अचानक चुप हो जाती हैं, तो छोटी जासूस सिया हवा की धाराओं, पत्तियों और सुराग़ों के पीछे चलकर पता लगाती है कि हवा ने अपना रास्ता क्यों बदल लिया।

बरामदे की घंटियाँ हवा चलते ही हमेशा गाने लगती थीं। पर आज हवा ने बाड़ के झंडे को हिलाया, घास को गुदगुदाया और बरामदे के पास से सीधी निकल गई। घंटियाँ पत्थर की तरह चुप रहीं। “अरे, ये क्या बात हुई!” सिया ने सिर टेढ़ा करके कहा। “हवा वाले दिन तो ये हमेशा बजती हैं। अजीब है…”
सिया बरामदे की सीढ़ियाँ चढ़ी और पीतल की ठंडी घंटियों को छुआ। वे ज़रा-सी हिलीं और फिर एकदम रुक गईं। “इन तक हवा पहुँच ही नहीं रही,” वह धीरे से बोली। “अजीब है…” उत्सुकता से बरामदे के फ़र्श के तख़्ते सूँघने लगा। उसकी पूँछ ऐसे हिल रही थी जैसे उसकी नाक को पहले ही कुछ बढ़िया मिल गया हो।
जाली वाले दरवाज़े के पीछे से नानी कोमल की आवाज़ आई। “बीस बरस से इन घंटियों ने हवा चलने पर बजना नहीं छोड़ा,” उन्होंने कहा। जाली के पीछे उनकी चाँदी जैसे सफ़ेद बालों वाली हल्की-सी परछाईं दिख रही थी। “बाहर ज़रूर कुछ बदला है।”


