अर्जुन का फ़ौलादी दिल
आयु 6–8
चैंपियनशिप मैच में जब तीन गोल उसके हाथ से निकल जाते हैं, तब अर्जुन को हिम्मत जुटानी पड़ती है कि वह अपने दिल को खेल में बनाए रखे, एक कमाल का बचाव करे और सच्चे चैंपियन की तरह हाथ मिलाए।

चैंपियनशिप का मैच शुरू हो गया था! अर्जुन गोल-बॉक्स में पंजों के बल उछल रहा था। उसने अपने लकी सिक्के वाले हार को दो बार थपथपाया। “लोहे जैसे दिल, डटकर खड़ा रह,” उसने खुद से धीरे से कहा। भीड़ ज़ोर से चिल्ला उठी। कहीं दूर सीटी बजी, तेज़ और साफ़।
फ़ाल्कन्स का एक स्ट्राइकर तेज़ी से आगे दौड़ा और उसने ज़ोर की किक मारी। गेंद सनसनाती हुई अर्जुन की उँगलियों के पास से निकली और जाल में जा घुसी। पहला गोल। उसका पेट ऐसे बैठ गया जैसे उसमें पत्थर गिर गया हो, फिर भी उसने अपनी ही टीम के लिए ताली बजाई। “अगला रोक लेंगे,” उसने आवाज़ लगाई।
दो गोल और निकल गए। पूरे तीन गोल! अर्जुन की आँखों में गरम आँसू चुभने लगे और उसकी ठुड्डी नीचे झुकने को हुई। तभी उसे अपने दादाजी की बात याद आई: “गोलकीपर का दिल लोहे का होता है, चोट लगने पर भी।”


