विवान का दयालुता वाला रडार
आयु 6–8
विवान को एक चुपचाप वाली ताक़त का पता चलता है: वह दूसरे बच्चों के उन छोटे उदास इशारों को भाँप लेता है जो किसी और की नज़र से छूट जाते हैं। फिर एक पूरे दिन वह चुपके-चुपके, मज़ेदार और हिम्मत भरे छोटे-छोटे अच्छे कामों से तीन दोस्तों का मन हल्का करता है, बिना किसी से तारीफ़ चाहे।

विवान के पास एक राज़ वाली ताक़त थी। उड़ने वाली नहीं, ज़बरदस्त ज़ोर वाली भी नहीं, बल्कि कुछ चुपचाप वाली। वह भरे हुए मैदान के उस पार से भी किसी का उदास मन भाँप लेता था। बच्चे एक-एक करके आ रहे थे, उनके बस्ते उछल रहे थे, और फाटक चरर-चरर खुलता-बंद होता जा रहा था। उसकी नोटबुक उसकी जेब में रखी थी। आज उसे पहले से ही लग रहा था कि यह तीन-बीप वाला दिन होगा।
बीप! उसका रडार बज उठा। मैदान के उस पार अकेली बेंच पर बैठी थी। बाकी बच्चों के साथ हँसने की जगह वह अपने जूतों को घूर रही थी। उसका धारियों वाला बस्ता भी पास में ऐसे झुका पड़ा था, जैसे वह भी उदास हो। “यह रहा मेरा पहला बीप,” विवान ने धीरे से कहा और सीधा बेंच की ओर चल दिया।
विवान ने यह नहीं पूछा कि क्या हुआ। उसने अपनी नोटबुक खोली, उसमें से एक पुरानी आड़ी-तिरछी चित्रकारी वाला पन्ना ढूँढकर फाड़ा और बेंच पर सरका दिया। उस पर लिखा था, “तुम सबसे मज़ेदार मुँह बनाती हो! करके दिखाओगी?” ने पलकें झपकाईं, पर्ची खोली और रोकते-रोकते भी उसके मुँह से हँसी फूट पड़ी। “अच्छा ठीक है,” वह बोली, “पर सिर्फ़ इसलिए कि तुमने अच्छे से कहा।”


