कबीर और सुनहरी घंटी की दूसरी कोशिश
आयु 6–8
जब ऊँचाई का डर कबीर को क्लाइम्बिंग दीवार पर आधे रास्ते में जमा देता है, तो उसे साँस लेना, सिर्फ़ अगली पकड़ पर ध्यान लगाना और फिर से कोशिश करना सीखना पड़ता है, ताकि वह आख़िरकार सबसे ऊपर की घंटी बजा सके।

कबीर को क्लाइम्बिंग जिम दुनिया की किसी भी जगह से ज़्यादा पसंद था। आज वह सबसे ऊँची दीवार के नीचे खड़ा था, जिसकी चोटी पर बहुत ऊपर एक सुनहरी घंटी चमक रही थी। "बस अगली पकड़," उसने धीरे से कहा और अपने हाथों पर चॉक लगाई।
कोच मीरा ने उसके लाल हार्नेस को हल्के से खींचकर जाँचा। "पट्टे कसे हैं?" उन्होंने पूछा। "बिल्कुल कसे!" कबीर मुस्कुराया और किस्मत के लिए अपना चाँदी का सीटी वाला चार्म लगा लिया। नीचे मैट पर खड़ा जोनू हाथ हिला रहा था। वह आठ साल का गोल-मटोल लड़का था, उसके छोटे घुँघराले भूरे बाल थे, चेहरे पर झाइयाँ थीं और उसने चमकीली नारंगी टी-शर्ट पहनी थी। "तुम कर लोगे, कबीर!" उसने आवाज़ लगाई।
और वह चढ़ने लगा! हाथ, पैर, हाथ, पैर। बस अगली पकड़, उसने खुद से कहा। नीली पकड़ें पीछे छूटीं, फिर पीली आईं, फिर नारंगी। हर बार हाथ बढ़ाने पर कबीर का दिल खुशी से धक-धक करता। नीचे मैट छोटे, और छोटे, और छोटे होते गए।


