आरव और साइकिल ठीक करने वाला दिन
आयु 6–8
जब छोटे पड़ोसी सोनू की साइकिल की चेन उतर जाती है और उसकी दोपहर बिगड़ जाती है, तो आरव अपना भरोसेमंद औज़ार-डिब्बा उठा लेता है, इस उम्मीद में कि वह सचमुच अकेले इसे ठीक कर सकता है, और सब्र के साथ एक-एक कड़ी जोड़कर सवारी फिर से चलने लायक बना देता है।

आरव अपनी साइकिल धीरे-धीरे चलाता हुआ बड़े से ओक के पेड़ के पास से गुज़रा। टोकरी में रखा टिन का औज़ार-डिब्बा खड़-खड़ कर रहा था। एक बार उसने चरमराता फाटक ठीक किया था, और एक डगमगाता ठेले का पहिया भी, पर तब हमेशा कोई न कोई उसके कंधे के ऊपर से देख रहा होता था। आज वह सोच रहा था: क्या वह अकेले ही कुछ ठीक कर सकता है, शुरू से आख़िर तक?
"रुको! रुको!" किसी ने ज़ोर से पुकारा। सोनू ईंट की दीवार के पास सन्न खड़ा था। उसकी छोटी लाल साइकिल एक तरफ़ गिरी पड़ी थी, और उसकी चेन टूटे हार की तरह ढीली और चिकनी लटक रही थी। "ये अचानक रुक गई!" सोनू बोला, उसके होंठ काँप रहे थे। "अब मैं पार्क कैसे जाऊँगा? सब वहाँ पहुँच चुके हैं, मेरे बिना!"
आरव अपनी साइकिल से उतरा और सोनू की साइकिल के पास घुटनों के बल बैठ गया। मोती ने चेन सूँघी और चिंता से हल्की-सी कूँ-कूँ की। पहले तो मुड़ा हुआ लोहे का मडगार्ड देखकर बुरा लगा, जैसे कुछ टूट गया हो, पर झुककर ध्यान से देखने पर आरव को सच दिख गया। चेन टूटी ही नहीं थी। वह तो बस गियर के दाँतों से फिसलकर उतर गई थी।


