अर्जुन और ओक गली की धीमी आवाज़
आयु 6–8
जब अर्जुन को पड़ोसी का कुत्ता बाड़ के पीछे खुला और बुरी तरह डरा हुआ मिलता है, तो वह जान जाता है कि असली हिम्मत चीख़ में नहीं, फुसफुसाहट में होती है।

ओक गली में पतझड़ के पत्तों और गरम टोस्ट की ख़ुशबू फैली थी। अर्जुन धीरे-धीरे घर की ओर चल रहा था। वह पैर से एक चीड़ का कोन लुढ़काता जा रहा था और उसकी सीटी डोरी पर उछल रही थी। तभी एक आवाज़ ने उसे वहीं रोक दिया। कोई डरा हुआ कुत्ता ऊँची आवाज़ में बार-बार भौंक रहा था। आवाज़ वर्मा अंकल की बाड़ के पीछे से आ रही थी। उसका दिल धक् से रह गया।
अर्जुन ने बाड़ की दरार से झाँका। उसे वर्मा अंकल का छोटा-सा टेरियर दिखा। वह बिना पट्टे के, शेड के पास कोने में दुबका खड़ा था। उसके रोएँ खड़े थे और पूरा बदन हवा में पत्ते की तरह काँप रहा था। अर्जुन ने तख़्तों के बीच से फुसफुसाकर कहा, “आराम से। मैं तुम्हें देख रहा हूँ। सब ठीक है।”
अर्जुन का दिल ढोल की तरह धड़-धड़ करने लगा। उसका मन हुआ कि वह चिल्लाता हुआ मदद के लिए भाग जाए। पर उसे स्कूल की एक बात याद आई। डरे हुए जानवर को शोर नहीं, शांति चाहिए। उसने भागने की जगह एक लंबी, धीमी साँस ली, फिर एक और।


