कबीर और हॉलो गली की वह चुनौती

आयु 6–8

जब बड़े बच्चे कबीर को सुनसान घर की खिड़कियाँ तोड़ने की चुनौती देते हैं, तो उसे तय करना होता है कि वह हाथ में पकड़ा पत्थर फेंके या चुपचाप वहाँ से चले जाने की हिम्मत जुटाए।

"कबीर और हॉलो गली की वह चुनौती" का कवर

कबीर हॉलो गली की टूटी-फूटी पटरी पर एक कंकड़ को ठोकर मारता चल रहा था। उसकी जेब में उसका लकी पत्थर गरम-गरम रखा था। “ताक़त शोर नहीं करती,” उसने अपने आप से धीरे से कहा। उसे अपने दादाजी की बात याद आ रही थी। आगे झुकी हुई बाड़ के पास रोहन, गोलू और खड़े इंतज़ार कर रहे थे। “अरे, इतनी देर लगा दी!” रोहन ने मुस्कुराते हुए हाथ हिलाकर उसे बुलाया।

“ऊपर वाली वह खिड़की देख रहा है?” रोहन ने घर के सबसे ऊँचे टूटे काँच की ओर इशारा किया। “मैं शर्त लगाता हूँ, तुझसे निशाना नहीं लगेगा।” गोलू खी-खी करके हँस पड़ा। की मुस्कान गायब हो गई। कबीर ने ऊपर देखा। अँधेरा, नुकीला काँच। उसे लगा कि जेब में लकी पत्थर भारी हो गया है, जैसे उसे पहले से पता हो कि आगे क्या होने वाला है।

रोहन ने ज़मीन से एक खुरदरा पत्थर उठाया और कबीर की हथेली पर रख दिया। “चल न, सबने फेंका है। गोलू ने भी।” गोलू ने जल्दी-जल्दी सिर हिलाया। कबीर उस खुरदरे चुनौती वाले पत्थर को उँगलियों में घुमाता रहा। उसका अपना चिकना लकी पत्थर जेब में अलग, सुरक्षित, शांत और ठंडा रखा था।

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